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जानिए कैसे हुई होली की शुरुआत और कहाँ है वो स्थान

रंगोत्सव अर्थात धूलिवंदन पर विशेष

ऋतुराज बसंत अपने शबाब पर है । गुलाबी सर्दी के बीच फागुन की मस्ती छायी हुई है। रोमांस के लिए फागुन का यह महीना हमेशा से आदर्श मौसम रहा है। सोमवार नौ मार्च को मदनोत्सव की पूर्व संध्या पर होलिका दहन होगा और अगली सुबह होगा रंगोत्सव का त्यौहार अर्थात होली जिसे हम बतौर धूलिवंदन भी जानते हैं ।

हमारे देश मे होली के प्रादुर्भाव को लेकर तरह तरह की दंत कथाएँ हैं और इसके मूल स्थान को लेकर भी भिन्न मत हैं । कोई कहता है नरसिंह पुर तो कोई हम्पी मानता है और कोई प्रहलादपुरी का नाम लेता है। स्थान को लेकर भले ही मत मतान्तर हैं । लेकिन होली के पीछे की कहानी एक ही है। वो है नृसिंह का अवतार और दुष्ट राक्षस हिरण्यकष्यप का वध। इसके पीछे कई कहानियां जरूर जोडी गयीं। लेकिन सच यह है कि होली यानी मदनोत्सव कोई पौराणिक गाथा नहीं बल्कि भारतीय इतिहास का एक ऐसा अभिन्न हिस्सा है, जिसके वैज्ञानिक प्रमाण का साक्षी होने का भी मुझे सुयोग हाथ लगा था लगभग 37 बरस पहले।

सच कहूँ तो एक समय खुद मुझे भी जानकारी नहीं थी कि होली जैसे रंगोत्सव का उद्गम स्थल मुल्तान है जो पाकिस्तान में है और जिसे आर्यों का बतौर मूलस्थान भी कभी जाना जाता था। आखिर कैसे जानता आम भारतीय। क्योंकि देश की सास्कृतिक धरोहरों और उनके पीछे की पृष्ठभूमि का इतिहास तो पाठ्यक्रम का हिस्सा रहा ही नहीं। हमने वही इतिहास जाना जो अंग्रेजो के जमाने में लिखा गया था।

भाग्यशाली हूं कि पहली बार १९७८ में जब पाकिस्तान गया तब वहां के सैन्य तानाशाह जियाउल हक ने मुल्तान किले के दमदमा ( प्रहलाद पुरी की छत ) पर भारतीय क्रिकेट टीम का सार्वजनिक अभिनंदन किया था। तब भी मैं इस स्थान की ऐतिहासिकता से वाकिफ नहीं हो सका था। मगर १९८२-८३ की क्रिकेट सिरीज के दौरान जाने माने पाकिस्तानी कमेंट्रीकार मित्र चिश्ती मुजाहिद के सौजन्य से जान पाया कि जहां मैं गोलगप्पे खा रहा हूं, उसका नाम प्रहलाद पुरी है..!! क्या..प्रहलाद ..? कौन भाई ? चिश्ती का जवाब था,’ हां वही तुम्हारे हिरण्यकश्प वाले….!! यह क्या बोल रहे हैं ..? हतप्रभ सा मैं सोच रहा था कि चिश्ती बांह पकड़ कर ले गये एक साइनबोर्ड के नीचे और जो पाकिस्तान पर्यटन की ओर से लगाया गया था- There is a Funny story से शुरुआत और फिर पूरी कहानी नृसिंह अवतार की। खंडहर मे तब्दील हो चुकी प्रहलाद पुरी मे स्थित विशाल किले के भग्नावशेष चीख चीख कर उसकी प्राचीन ऐतिहासिकता के प्रमाण दे रहे थे। वहां उस समय मदरसे चला करते थे और एक क्रिकेट स्टेडियम भी था।

पूरी कहानी यह कि देवासुर संग्राम के दौरान दो ऐसे अवसर भी आए हैं जब देवताओं और राक्षसों के बीच मैत्री-संधि हुई थी। एक असुर कुल के भक्त ध्रुव के समय और दूसरी प्रहलाद के साथ.जब उनके पिता हिरण्यकश्प का वध हो गया तब वहां संधि के उपलक्ष्य में एक विशाल यज्ञ का आयोजन हुआ। बताते हैं कि हवन कुंड की अग्नि छह मास तक धधकती रही थी और इसी अवसर पर मदनोत्सव का आयोजन हआ…जिसे हम होली के रूप में जानते हैं।

देश मे यह त्यौहार छोटे बडे का भेद इस दिन मिटा देता है। बनारस मे तो साल भर आपको प्रणाम करने वाला शख्स इस दिन विशेष पर खाँटी गालियों से नवाजता है और सामने वाला सिर्फ मुस्कुराता है।

यह समाजवादी त्यौहार क्यों है ? इसका कारण यही कि असभ्य-अनपढ़- निर्धन असुरों को पूरा मौका मिला था उस दिन देवताओं की बराबरी का। टेसू के फूल का रंग तो था ही, पानी, धूल और कीचड़ के साथ ही दोनो ओर हास परिहास से ओतप्रोत छींटाकशी भी खूब चली। उसी को आज हम गालियों से मनाते है। लेकिन बड़ों के चरणों की धूल भी मस्तक पर लगाते हैं, इसीलिए इस त्यौहार को धूलिवंदन भी कहा जाता है।

अयोध्या मे श्री राम जन्मस्थान पर बने मंदिर को तोड कर मुगल हमलावर बाबर ने उस पर एक मस्जिद तामीर कर दी थी । 1992 मे उस विवादित ढांचे को राम जन्मभूमि आन्दोलन के तहत कारसेवकों ने ढहा दिया था। उसके प्रतिशोध में पाकिस्तान और बांग्लादेश मे सैकडों मंदिरों को नेस्तनाबूत कर दिया या जला दिया गया था। मुल्तान भी उस चपेट में आया और वो ऐतिहासिक विरासत जला कर राख कर दी गयी। सिर्फ वह खंभा, जिसे फाड़ कर भगवान विष्णु बतौर नृसिंह अवतार प्रकट हुए थे, उसका बाल भी बाँका नहीं हुआ। गुगल में प्रहलादपुरी सर्च करने पर सिर्फ उस खंभे का ही चित्र मिलेगा।

यह कैसी विडंबना है कि हमें कभी यह नहीं बताया गया और न ही इसे पाठ्यक्रम में ही रखा गया। पाकिस्तान में तो भारतीय सास्कृतिक विरासतें चप्पे चप्पे पर बिखरी पड़ी हैं। उनको तो छोड़िए कभी यह तक नहीं बताया गया हमें कि नेपाल और श्रीलंका का भारत के साथ साझा इतिहास रहा है. आड़े आ गया होगा सेक्यूलरिज्म।

खैर , केंद्र में एक राष्ट्रीय सरकार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अस्तित्वमान है। तथाकथित धर्मनिरपेक्षता अब वेंटिलेटर पर है। उसका प्लग तभी हटाया जाएगा जब मुस्लिम और अंग्रेज इतिहासकारों के दुराग्रही इतिहास को हिंद महासागर में डुबो कर वृहद भारत के इतिहास का पुनर्लेखन होगा।इस पर काम शुरू होने में अब ज्यादा विलंब नहीं है। बस धैर्य के साथ प्रतीक्षा कीजिए।

वरिष्ठ पत्रकार पदम पति शर्मा के फेसबुक वाल से

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