फिल्म स्वदेश ने बदल दी इन युवा डॉक्टरों की सोच, जुट गए दीन-दुखियों की सेवा में

-आदिवासी, पिछड़े, दलित और गांव-गिरांव के लोगों की बेहतरी के लिए जुटे हैं
-कश्मीर से कन्या कुमारी, मुंबई से पश्चिम बंगाल, अरुणांचल, बिहार में दे रहे सेवा
-पहली बार आए यूपी के बनारस में
-सभी युवा डॉक्टर जु़ड़े हैं स्वदेश ग्रुप से
राजकुमार गुप्ता
वाराणसी, जनवरी । अक्सर फिल्मों को लेकर विवाद खड़े होते रहते हैं। लेकिन ये फिल्में समाज का आइना भी होती हैं और प्रेरणादायी भी। ये दीगर है कि ऐसी प्रेरणादायी फिल्में कम ही आती हैं या बॉक्स ऑफिस पर कम ही सफल हो पाती हैं। लेकिन इस वक्त देश में युवा डॉक्टरों की एक टीम एक फिल्म से प्रेरणा लेकर समाज के पिछड़ों, दलितों, वंचितों, आदिवासियों के लिए काम कर रही है। ये आदिवासी क्षेत्र, मलिन बस्ती और खास तौर पर गांवों में जा कर काम कर रहे हैं। सभी पढ़े-लिखे तो हैं ही, अच्छे संपन्न घरों से जुड़े हैं। ये युवा डॉक्टर पिछले दिनों आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में और तीन दिनों तक मलिन बस्तियों में घूम-घूम कर स्वास्थ्य शिवर लगाया और एक हजार से ज्यादा सफाईकर्मियों का निःशुल्क इलाज किया, उनके बीच दवाएं वितरित कीं।

दरअसल ये युवा चिकित्सक 2004 में रिलीज हुई अभिनेता शाहरुख खान की फिल्म स्वदेश से प्रेरित हुए। इन्होंने फिल्म के नाम पर ही युवाओं का संगठन बनाया जिसका नाम रखा स्वदेश ग्रुप। इस स्वदेश ग्रुप में महाराष्ट्र के मुंबई, कोलकाता, बिहार, दिल्ली से जुड़े डॉक्टर और इंजीनियर शामिल हैं। इनका उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों, स्लम्स और अति पिछड़े इलाकों में जा कर वहां के लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाना है। पिछड़े इलाके के बच्चों को शिक्षत करना है, लोगों को बेहतर स्वास्थ्य के लिए जागरूक करना है। कुपोषित बच्चों को कुपोषण से बाहर निकालना है। इस ग्रुप में युवकों के साथ युवतियां भी हैं।

पिछले दिनों वाराणसी आगमन पर इन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता राजकुमार गुप्ता के साथ अपने अनुभव साझा किए। इसमें महाराष्ट्र से आए डॉ निलेश ने बताया कि वह आसाम और अरुणांचल प्रदेश के शोषित, दलित, आदिवासी क्षेत्र में काम कर रहे हैं। बताया कि अभिनेता शाहरुख की फिल्म स्वदेश में शाहरुख को एक संपन्न घर का युवा दिखाया गया है, वह उच्च शिक्षा ग्रहण कर अमेरिका में एक बड़ी कंपनी में ऊंचे वेतन पर काम कर रहे होते हैं। लेकिन उन्हें अपने देश के वंचितों, शोषितों, दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों की याद आती है और नौकरी छोड़ कर आते हैं और लग जाते हैं मानव सेवा में। वह हम सभी के दिलों को छू गई। बस हमने भी ठान लिया कि एक ऐसा ही युवाओं का ग्रुप बनाया जाए और समाज के शोषित, पीड़ित लोगों की सेवा की जाए।

पेशे से साइक्रेटिक निलेश ने बताया कि हमारा ग्रुप स्वदेश कश्मीर से कन्या कुमारी, मुंबई से अरुणांचल प्रदेश तक फैला है। फिलहाल इस ग्रुप में 200 से ज्यादा डॉक्टर काम कर रहे हैं। निलेश ने बताया कि वह खुद असोम व अरुणांचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के बीच काम कर रहे हैं। बताया कि हम लोग युवाओं में एंगर, मनासिक बीमारियों को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं। झारखंड व कश्मीर में भी काम चल रहा है।
इसी तरह डॉ नीरज बिहार के पिछड़े इलाकों में युवाओं, बच्चों और महिलाओं के लिए काम कर रहे हैं। मुंबई से आए डॉ उमेश का कहना है कि समाज में बदलाव युवा ही लाते हैं इसी सोच के साथ हम लोगों ने मानव सेवा को अपना लक्ष्य बनाया। पेशे से इंजीनियर डॉ उमेश ने कहा कि हम लोगों का काम ग्रामीण इलाकों में ज्यादा है क्योंकि वहां ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं नहीं हैं, वहां के सीधे-सज्जन लोगों को स्वास्थ्य, शिक्षा, रहन-सहन, खान-पान, सफाई के प्रति जागरूक किया जा रहा है। कोशिश उनका जीवन स्तर ऊंचा करना है। बच्चों को अच्छी तालीम दिलाना, महिलाओं की सेहत में सुधार करना है।
छत्तीसगढ से आई महाराष्ट्र के मुंबई निवासी स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ एऐश्वर्या कहती हैं कि वो पिछड़े इलाकों की महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य के लिए काम कर रही हैं। उनका मानना है कि देश में इतनी प्रगति के बाद भी महिलाओं की समस्या को लगातार अनदेखा किया जा रहा है। महिलाएं आज भी पिछड़ी हैं, उन पर अत्याचार ज्यादा हो रहे हैं। ऐसे में उनको मानिसक व शारीरक रूप से सेहतमंद करना हम सब का लक्ष्य है।

मूल रूप से बिहार की रहने वाली डॉ अनुपमा ने अपनी शिक्षा-दीक्षा कोलकाता में पूरी की। वाराणसी दौरे पर आई अनुपमा ने कहा कि छत्तीसगढ़ में काम करने के बाद अब वह बिहार के पिछड़े इलाकों में काम कर रही हैं।

बता दें कि इन सभी युवा डॉक्टरों को वाराणसी लाने वाले दलित फाउंडेशऩ के डिप्टी डायरेक्टर प्रदीप मोरे का कहना है कि युवाओं की सामुदायिक हिस्सेदारी को बढ़ाने के उद्देश्य से ही हम लोग काम कर रहे हैं। हमारा काम जातिवाद, छुआ-छूत को दूर करना और दलितों, पिछड़ों को बराबरी का हक दिलाना है।

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